Saturday, 23 May 2026

“वक़्त वही है, बस मैं और मेरी दुनिया के मायने बदल गए हैं”

23 मई 2025…
एक तारीख नहीं, जैसे समय की दीवार पर हमेशा के लिए उभर गया एक घाव।
एक साल बीत गया, लेकिन भीतर का खालीपन अब भी उसी दिन पर अटका हुआ है — बल्कि शायद और गहरा हो गया है।
माँ के जाने के बाद जिंदगी चल तो रही है, मगर जीने के मायने बदल गए हैं। जिम्मेदारियाँ बढ़ गईं, तरीक़े बदल गए, लोगों से मिलने का ढंग बदल गया… और सबसे ज़्यादा बदल गया है — खुद का भीतर।

पहले जिंदगी एक थी — बाहर की।
अब दो जिंदगी जीनी पड़ती है।
एक वो, जो दुनिया देखती है…
और दूसरी वो, जिसमें इंसान खुद के साथ बिल्कुल अकेला होता है।

कभी-कभी मैं खुद को उस तस्वीर में खड़े बच्चे जैसा महसूस करता हूँ —
1945 के जापान की वह तस्वीर, जिसमें कोई रंग नहीं, कोई शब्द नहीं… फिर भी वह तस्वीर लाखों दिलों में ऐसी चीख बनकर गूंजती है जिसे अनसुना करना नामुमकिन है।

उस तस्वीर का नाम है —
“The Boy Standing by the Crematory”

एक छोटा बच्चा…
पीठ पर अपने मृत छोटे भाई को बाँधे हुए…
शमशान के सामने खड़ा।
चेहरे पर आँसू नहीं।
आँखों में शिकायत नहीं।
बस एक मौन… इतना गहरा कि पूरी दुनिया की आवाज़ें उसके सामने छोटी लगें।

माँ के जाने के बाद शायद इंसान भी ऐसा ही हो जाता है।
रोना धीरे-धीरे बंद हो जाता है, लेकिन भीतर एक शमशान हमेशा जलता रहता है।
लोग कहते हैं — “समय सब ठीक कर देता है।”
लेकिन सच यह है कि समय सिर्फ जीना सिखाता है, भूलना नहीं।

एक साल पहले तक “घर” एक जीवंत घर था।
अब घर में सबके होने के बावजूद सिर्फ दीवारों में सन्नाटा और खामोशी है।
पहले जिम्मेदारियाँ महसूस ही नहीं होती थीं, क्योंकि सिर पर माँ की छाया थी।
अब हर फैसला लेने से पहले उनकी जिम्मेदारियाँ याद आती हैं।
हर बार फोन पर वही कहना —
“घर आ जाओ… उतना दूर क्यों रहना, सब कुछ तो है यहाँ।”
और अब…
अनायास ही आँखें डबडबा जाती हैं,
खामोशी और गहरी हो जाती है।

माँ के जाने के बाद आदमी बड़ा नहीं होता…
बस अचानक बूढ़ा हो जाता है भीतर से।
हँसता है, काम करता है, लोगों से मिलता है…
लेकिन हर खुशी के पीछे एक खाली कुर्सी हमेशा दिखाई देती है।

कुछ रिश्ते मौत से खत्म नहीं होते।
माँ उनमें सबसे ऊपर होती है।
वो चली जाती है, लेकिन उसकी आदत नहीं जाती।
आज भी कोई अच्छी खबर मिलती है तो सबसे पहले मन उसी को बताने भागता है…
फिर याद आता है —
अब वहाँ सिर्फ आसमान है।

एक साल बाद भी घाव वैसा ही है।
शायद इसलिए क्योंकि माँ सिर्फ एक इंसान नहीं होती…
वो हमारी पूरी दुनिया होती है।
और जब दुनिया चली जाए, तो इंसान जीता जरूर है…

लेकिन पहले जैसा कभी नहीं रहता। 

Thursday, 12 June 2025

माँ जहाँ तुम रुकीं, वहीं ठहर गई मेरी दुनिया!


माँ जहाँ तुम रुकीं, वहीं ठहर गई मेरी दुनिया!
23 मई २०२५ एक मनहूश सुबह, 
माँ, तुम अचानक चली गईं। सब कुछ जैसे थम गया। दुनिया बदल गई, जिस जीवन को तुम्हारे साये में जिया, वह तुम्हारे बिना अब एक अधूरी कहानी जैसा लगता है। तुमने तो कभी शिकायत नहीं की, पर आज तुम्हारी खामोशी मेरे भीतर एक असहनीय शोर बन गई है। काश मैं समय को पीछे मोड़ सकता, काश उस अंतिम क्षण को पकड़ पाता, कुछ और पल तुम्हारे साथ बिता पाता। तुम्हारा यूँ चुपचाप चला जाना जैसे मेरी आत्मा को दो हिस्सों में बाँट गया — एक जो चलता है, बोलता है, सांस लेता है… और एक जो वहीं रुक गया है जहाँ तुमने मुझे छोड़ दिया।

आज समझ में नहीं आता, कि दोष किसका है? किससे विरोध करूँ? प्रकृति से? समय से? खुद से? शायद किसी से नहीं। क्योंकि प्रकृति से बड़ा, मर्मस्पर्शी, जीवंत और विनाशकारी कुछ और नहीं। वही प्रकृति, जो जीवन देती है, वही उसे एक झटके में छीन भी लेती है — बिना चेतावनी, बिना समझौते। और जब छीन लेती है, तो पीछे जो छूटता है, वो बस शून्यता होती है। एक ऐसा खालीपन जिसे कोई शब्द भर नहीं सकते। आज तक न कोई विज्ञान, न कोई खोज, न कोई वैज्ञानिक मृत्यु पर विजय प्राप्त कर पाया है। वह सबसे बड़ा सत्य है — और सबसे अधिक कठोर भी।

कभी-कभी दर्द इतना असहनीय होता है; कि न आँख में आँसू बहते हैं, न चेहरे पर उदासी दिखती है। बस भीतर कुछ धीरे-धीरे बुझता रहता है। शरीर चलता है, पर आत्मा वहीं रुक जाती है — उसी बिंदु पर, जहाँ अपनों की आखिरी सांसें बिखरी थीं। योजनाएँ चकनाचूर हो जाती हैं, और ज़िंदगी कठोर होकर जीने को विवश कर देती है। हर दिन एक बोझ बन जाता है, और हर रात एक तन्हाई। सब कुछ होते हुए भी, सब अधूरा लगता है। और माँ, तुम तो सब कुछ थीं। मेरा बचपन, मेरी पहली हँसी, मेरा पहला डर, और मेरी सबसे पवित्र प्रार्थना — सब तुमसे ही तो था।

अब तुम नहीं हो, लेकिन तुम्हारी यादें हर सांस के साथ चलती हैं। तुम्हारा स्नेह अब मेरी धड़कनों में घुल गया है। तुम्हारा जाना तो सच है, पर तुम मुझमें बस गईं। तुम्हारा स्पर्श, तुम्हारा आँचल, तुम्हारी आँखों की दुआ… अब मेरी जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। मैं हर दिन तुम्हारे बिना जी रहा हूँ, लेकिन हर पल तुम्हारे साथ। और यही तुम्हारा प्रेम है — जो मृत्यु से भी बड़ा हो गया है। मृत्यु से बड़ा कोई सच नहीं, लेकिन माँ, तुम्हे महसूस कर सकता हूं, पर स्पर्श नहीं, सच सामने है पर यकीन अब भी नहीं 😔😔

Thursday, 1 May 2025

जब आँसू नहीं बहे, पर दुनिया रो पड़ी

 

"शमशान के सामने खड़ा वो बच्चा" – जापान की आत्मा, मौन में बोलती हुई

Monday, 17 August 2020

शहर - जो सिगरेट के कश अंदर लेता है, और पॉलिटिक्स बाहर छोड़ता है!

कलकत्ता - क्या नहीं था इस शहर के पास ! बंदरगाह, पास में ही खनिजों का भंडार, मैदानी क्षेत्रों से जुड़ी हुई रेल, दामोदर वैली का पानी, सी..एस.सी. का बेहतरीन बिजली नेटवर्क, चाय बागानों से निकटता!!!

पूर्व मुख्यमंत्री - श्री ज्योति बसु: पश्चिम बंगाल
 भूत पूर्व मुख्यमंत्री - स्वर्गीय श्री ज्योति बसु पश्चिम बंगाल 
रोचक प्रसंग है - १९६५ में सिंगापुर के प्रथम प्रधानमंत्री ली कुवान यू ने कहा था "मैं सिंगापुर को कलकत्ते की तरह बनाना चाहता हूं" | इन्हीं ली साहब ने २००७ में अपने पुत्र (जो उस वक़्त सिंगापुर के प्रधानमंत्री थे) से कहा था - "थोड़ी लापरवाही, और सिंगापुर को कलकत्ता बनने में देर नहीं लगेगी, बेटे. बहुत सजग रहने की जरूरत है" |
कलकत्ता - क्या नहीं था इस शहर के पास ! बंदरगाह, पास में ही खनिजों का भंडार, मैदानी क्षेत्रों से जुड़ी हुई रेल, दामोदर वैली का पानी, सी..एस.सी. का बेहतरीन बिजली नेटवर्क, चाय बागानों से निकटता !!
1950 में कोलकाता की कुल आबादी थी 45 लाख, उस वक़्त मुंबई और दिल्ली की आबादी क्रमश 26 लाख और 14 लाख थी | 2011 में कोलकाता की कुल आबादी रही 1.40 करोड़ वहीं मुंबई और दिल्ली की 1.90 करोड़ और 1.65 करोड़. और यह तब है, जबकि कोलकाता में अन्य महानगरों के मुकाबले शरणार्थियों की संख्या काफी अधिक थी | स्पष्ट है कि कलकत्ता, महानगरों की रेस में बहुत ही पीछे छूट गया |
कभी कभी लगता है जैसे इस शहर के साथ बेईमानी हो गई. कोई बड़ा छल किया गयाएक पान बीड़ी की दुकान भी कोई लगाना चाहता था तो पहुंच जाते थे कॉमरेड लोग हाथ में रसीद ले कर - "कितने की पर्ची काटें?" 
बालीगंज - बड़ा बाज़ार के मारवाड़ी उद्योगपतियों को ब्लैकमेल करना शुरू किया जाने लगा. चंदा दो नहीं तो हड़ताल! ऊपर से एक से बढ़कर एक बेईमान छुटभैयए; लाल सलाम बोल के लाल लाल नोट हथियाने वाले!
ऐसा नहीं था कि कम्युनिस्ट राज में सिर्फ निजी क्षेत्र ही बर्बाद हो रहा था, रूस की देखा देखी कम से कम सरकारी उद्यमों का तो ख्याल रखना चाहिए था - ज्योति बसु ने उस ओर भी शून्य पहल की. जहां कम्युनिस्ट शासित केरल ने लगभग १०० राज्य पब्लिक सेक्टर खड़े किए (नुकसान - मुनाफा एक अलग बहस है, कम से कम विचारधारा के अनुरूप कुछ किया तो) वहीं इतने लंबे कम्युनिस्ट शासन के बाद भी बंगाल ने कोई नए पब्लिक सेक्टर नहीं खड़े किए |
मार्क्स के कम्युनिज्म का आधार में मुख्य अंश ही अर्थव्यवस्था है - और इन कम्युनिस्ट राजा ने उसी आधार को गायब कर दिया |
नासमझ लोग इसी में खुश थे कि पार्क स्ट्रीट में जो मिष्टी दही का कुल्हड़ १९८० में रुपए का था वो वर्ष २००० में भी रुपए का मिल रहा है; मगर समझदार लोग समझ चुके थे कि तरक्की रुक चुकी है इस शहर की. आर्थिक रूप से जड़ हो चुका है यह शहर - इसलिए " रेवोल्यूशन " का मोह छोड़ो और पलायन करो |
धीरे धीरे उद्योगपतियों, विद्यार्थियों, कलाकारों, कारीगरों - सबने पलायन शुरू कर दिया! जो एक बार कलकत्ते से निकल गए, रिटायरमेंट से पहले तो वापस लौट कर नहीं जाना चाहते |
अस्वीकरण - तृणमूल सरकार आने से उम्मीद की एक लहर दिखी थी. मगर ममता दीदी का तरीका भी वहीं है जो बसु दा का था - नस नस में पार्टी पॉलिटिक्स भर दो. किताब में पढ़ा था - हम ऑक्सीजन अंदर लेते हैं और कार्बन डाई ऑक्साइड बाहर छोड़ते हैं. हावड़ा स्टेशन से बाहर निकलते ऐसा महसूस होता है जैसे यह शहर सिगरेट के कश अंदर लेता है, और पॉलिटिक्स बाहर छोड़ता है!