23 मई 2025…
एक तारीख नहीं, जैसे समय की दीवार पर हमेशा के लिए उभर गया एक घाव।
एक साल बीत गया, लेकिन भीतर का खालीपन अब भी उसी दिन पर अटका हुआ है — बल्कि शायद और गहरा हो गया है।
माँ के जाने के बाद जिंदगी चल तो रही है, मगर जीने के मायने बदल गए हैं। जिम्मेदारियाँ बढ़ गईं, तरीक़े बदल गए, लोगों से मिलने का ढंग बदल गया… और सबसे ज़्यादा बदल गया है — खुद का भीतर।
पहले जिंदगी एक थी — बाहर की।
अब दो जिंदगी जीनी पड़ती है।
एक वो, जो दुनिया देखती है…
और दूसरी वो, जिसमें इंसान खुद के साथ बिल्कुल अकेला होता है।
कभी-कभी मैं खुद को उस तस्वीर में खड़े बच्चे जैसा महसूस करता हूँ —
1945 के जापान की वह तस्वीर, जिसमें कोई रंग नहीं, कोई शब्द नहीं… फिर भी वह तस्वीर लाखों दिलों में ऐसी चीख बनकर गूंजती है जिसे अनसुना करना नामुमकिन है।
“The Boy Standing by the Crematory”
एक छोटा बच्चा…
पीठ पर अपने मृत छोटे भाई को बाँधे हुए…
शमशान के सामने खड़ा।
चेहरे पर आँसू नहीं।
आँखों में शिकायत नहीं।
बस एक मौन… इतना गहरा कि पूरी दुनिया की आवाज़ें उसके सामने छोटी लगें।
माँ के जाने के बाद शायद इंसान भी ऐसा ही हो जाता है।
रोना धीरे-धीरे बंद हो जाता है, लेकिन भीतर एक शमशान हमेशा जलता रहता है।
लोग कहते हैं — “समय सब ठीक कर देता है।”
लेकिन सच यह है कि समय सिर्फ जीना सिखाता है, भूलना नहीं।
एक साल पहले तक “घर” एक जीवंत घर था।
अब घर में सबके होने के बावजूद सिर्फ दीवारों में सन्नाटा और खामोशी है।
पहले जिम्मेदारियाँ महसूस ही नहीं होती थीं, क्योंकि सिर पर माँ की छाया थी।
अब हर फैसला लेने से पहले उनकी जिम्मेदारियाँ याद आती हैं।
हर बार फोन पर वही कहना —
“घर आ जाओ… उतना दूर क्यों रहना, सब कुछ तो है यहाँ।”
और अब…
अनायास ही आँखें डबडबा जाती हैं,
खामोशी और गहरी हो जाती है।
माँ के जाने के बाद आदमी बड़ा नहीं होता…
बस अचानक बूढ़ा हो जाता है भीतर से।
हँसता है, काम करता है, लोगों से मिलता है…
लेकिन हर खुशी के पीछे एक खाली कुर्सी हमेशा दिखाई देती है।
कुछ रिश्ते मौत से खत्म नहीं होते।
माँ उनमें सबसे ऊपर होती है।
वो चली जाती है, लेकिन उसकी आदत नहीं जाती।
आज भी कोई अच्छी खबर मिलती है तो सबसे पहले मन उसी को बताने भागता है…
फिर याद आता है —
अब वहाँ सिर्फ आसमान है।
एक साल बाद भी घाव वैसा ही है।
शायद इसलिए क्योंकि माँ सिर्फ एक इंसान नहीं होती…
वो हमारी पूरी दुनिया होती है।
और जब दुनिया चली जाए, तो इंसान जीता जरूर है…
लेकिन पहले जैसा कभी नहीं रहता।


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